तुम्हारी यादें!

मैं तुझमें गुम हूँ …

समझ नहीं आता क्या करूँ… क्या कहूँ… कैसे कहूँ…?

कहना तो सिर्फ तुमसे है … सबकुछ… सारी बातें बताना चाहती हूँ…!

कि.. तुम्हें क्यूँ चाहती हूँ…

क्या रिश्ता है तुमसे..?

क्यूँ तुम इतने दूर होके भी हमेशा सबसे पास हो…!

क्या हो तुम?

कह तो दूँ तुमसे पर क्या कहूँ..?

ये कुछ सवाल हैं जिनके जवाब मुझे भी पता नहीं है…!

तुम बता दो.. क्यूँ की सवाल भी तुमसे हैं और जवाब भी तुम हो..!

मैंने इतना नहीं चाहा किसी को.. की उसको बता भी ना सकूँ की क्यूँ चाहती हूँ!

तुम्हारी मासूम आँखें जब मुझे देखती हैं प्यार से… ऐसे लगता है.. सारी दुनिया से लड़ सकती हूँ इनमें रहने के लिए!

वो तुम्हारे छूने में जो एहसास है वो कहीं और नहीं मिलता…!

वो तुम्हारे साथ जो होती हूँ.. कहीं और नहीं होती!

मुझे पता है.. तुम मेरे लिए नहीं हो.. ज़हर की तरह हो.. जिसकी लत मेरी जान ले लेगी..

लेकिन वो एक एहसास जो जीने का तुम्हारे साथ बिताए पल में आता है.. वो पूरी ज़िन्दगी से भी ज्यादा खुशी दे जाता है!

तुम्हारे साथ पूरी होती हूँ… तुम्हारे बिना आधी भी नहीं..!

मेरा हिस्सा कहीं ना कहीं तुम में रह जाता है..

और… तुम…. कहीं भी नहीं..! ❤

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